
इंडियन हैडलाइन न्युज/ भंडारा प्रतिनिधी
एक रुपए का एक दीया,
तो दस रुपए में दस दीये।
उसमे भी मोल भाव क्यों करना है तुम्हें।
धन्य है वे सब,
जो दस रुपए में चिप्स के साथ हवा है खरीदते।
थोड़ा विचार तो जरूर करना है तुम्हें।
क्या सच में उस पैकट में,
उस दीये से ज्यादा खूबी है।
या मोल भाव न करना हमारी मजबूरी है।
क्या कभी सोचा है हमने,
दीपावली मनाना क्या हमारा ही जरूरी है।
उस नन्हें से दीपक के बिना,
हम सबकी दीपावली रहती अधूरी है।
तभी तो……..
मंजू की लेखनी कहती सबसे।
अब की बार जब दीये खरीदने तुम जाना।
मोल भाव कभी न करना।
क्योंकि हमारा भी तो यह फर्ज बनता है।
हो रौशन उनकी भी दीपावली।
जो हमारा घर रौशन करने की खातिर,
दिन रात मेहनत करते है।
फिर भी क्यों उन्हीं से हम सब मोल भाव करते है।
आओ चलो आज से अभी से यह प्रण हम करें।
अब से अभी से अपने भारत में बने दिये ही हम खरीदे।
और उनसे कभी न अब कोई मोल भाव हम करें।
उनकी मेहनत का फल उन्हें भी मिले।
उनके घर भी रौशन दीपावली फिर मने।।
स्वरचित
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)





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