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“शादी की अंगूठी: मंजू अशोक राजाभोज”

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इंडियन हैडलाइन न्यूज़/ भंडारा प्रतिनिधि 

शादी की अंगूठी का महत्व, तो चला आ रहा हैं सदियों से |

लेकिन आज बताए तुम्हें, अपनी लेखनी के माध्यम से |

अब समय का दौर, कुछ बदल सा गया हैं |

जब तक न होती, आजकल लोगों की शादी |

तब तक हैं सोचते, कब होगी हमारी शादी |

कब कोई पहनाएगा हमें, खूबसूरत सी शादी की अंगूठी |

जब हो जाती उनकी शादी, तब शादी की अंगूठी पहनकर |

पहले सब हैं बहुत इतराते |

दोस्त भाइयों के पास जा-जाकर, शान से हैं इसे दिखलाते |

लेकिन इसके महत्व को, ठीक से कभी समझ ही न पाते |

जब होती आपस में, छोटी-मोटी सी तकरार कभी |

उसे हाथों से उतार फेकते, एक झटके में सभी |

जैसे रहा हो, यह एक दो दिन का ही किस्सा |

हँसी-खेल में शादी की अंगूठी के संग, 

वह खूबसूरत एहसास भी जैसे पल-भर में हैं मन से रिसता |

आखिर कोई इसके महत्व को, क्यों न हैं सही में समझता |

मानो जुड़ा हो, 

सिर्फ शादी के अंगूठी के बल पर ही यह रिश्ता |

मंजू की लेखनी कहती सबसे |

यह तो होता जन्मों-जन्मों का रिश्ता |

जो ईश्वर की मर्जी से ही है हरदम जुड़ता |

फिर हँसी खेल सा, 

क्यों है आजकल कुछ लोगों को लगता |

यह तो है दिल से दिल का रिश्ता |

जो कभी-कभी उतार-चढ़ाव से भी होकर है गुजरता |

कई बार दिक्कतों भरी पगडंडियों से भी,

होकर है यह आगे बढ़ता |

कभी पतझड़ तो कभी बसंत की, बहार सा है यह लगता |

कई ठोकर खा-खाकर, है गिरता और संभलता |

जिन जीवन-साथी का यह रिश्ता |

कई परेशानियों को झेलकर भी है आगे बढ़ता रहता |

तभी तो शादी की अंगूठी से जुड़ा, यह प्यारा सा रिश्ता |

जन्म-जन्मांतर तक, एहसासों की नमीं के संग है यह टिकता |

उस नीली छतरी वाले की मर्जी से ही है यह जुड़ता |

तुम न समझो कभी, यह प्यारा सा खूबसूरत सा रिश्ता |

सिर्फ और सिर्फ, शादी की अंगूठी से ही है जुड़ता |

जो पल भर में कभी, यूँ ही तो न है टूट सकता |

यह तो खूबसूरत एहसासों के बल पर ही, हरदम है टिकता |

यह तो मुझे खुदा की इबादत सा, हर-पल है लगता |

मानाकि इसे फलने-फूलने में, थोड़ा वक्त जरूर है लगता | 

जो धैर्य के साथ इस रिश्ते में, हर पल आगे ही आगे है बढ़ता |

वही सही मायने में,’शादी की अंगूठी’ की कीमत को है समझता ||

स्वरचित

                          मंजू अशोक राजाभोज

                          भंडारा (महाराष्ट्र)

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