
आमगांव: महाराष्ट्र के पूर्वोत्तर सिमा से लगा हुआ एक छोटा सा शहर आमगांव तहसील तथा व्यापार के दृष्टिकोन से अतिमहत्वपूर्ण है. यह पवित्र स्थान प्राचिनकालीन संस्कृत के महाकवी एवं नाटककार भवभूती का स्थान है इसी पावन भूमी में एक महान समाजसेवी तथा कर्मठ कार्यकर्ता का जन्म हुआ. जिन्हें इस क्षेत्र की जनता श्रध्देय लक्ष्मणराव मानकर गुरुजी के नाम से जानती है. जीवन जिने की कला यो सिखाता है हमे रंग कैसे भरना है यह हमे तथ करन है, अध्देय गुरुजी ने यह निश्चय कर लिया था की गोंदिया आमगांव सालेकसा तथा देवरी जैरो दुर्गम क्षेत्र जो की एक आदिवासी बहुल प्रांत है, उनके जीवन में नया रंग भरमा है, उनके दुख तथा बाष्ट से भरे जीयन में स्फुर्ती का नया विजारोपण करना है. इसी ध्येय को साध्य करने हेतु श्रध्देय गुरुजी ने समाजसेवा का बिड़ा उठाया. गं.भा. श्रीमती गोदुबाई व स्थ. श्री बिसनलालजी मानकर इनके घर में 4 फरवरी 1929 के दिन तुमखेडा इस छोटेसे गांव में श्री श्रध्देय लक्ष्मणराव मानकर गुरुजी का जन्म हुआ था. पिता बिसनलालजी मानकर आमगांव क्षेत्र में पटवारी की नौकरी करते थे, अतः आमगांव उनके परिवार का निवास स्थान बना गुरुजी के माता-पिता अत्यंत दयालु एवं खेही थे. समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगो से उनका अच्छा संबंध था यही गुण स्व. लक्ष्मणराव मानकर गुरुजी को विरासत में मिला. गुरुजी की प्राथमिक शिक्षा आमगांव में हुयी. श्री प्रेमलालजी कटकवार इनके प्रयास से गुरुजी को संघ शाखा से जुडने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. उच्चशिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हे गोंदिया जाना पय भोलाराम बहेकार गुरुजी के बालसखा थे. उन्ही के घर में गुरुजी के रहने की व्यवस्था की गयी थी, गुरुजी प्रतिदीन संध्या के समय संघ शाखा में जाने लगे थे. वहीं रो उनपर संघ का संस्कार दिखाई पडने लगा. गुरुजी का विवाह इ.स. 1944 में उम्र के 15 व वर्ष में अत्यंत अल्पायु में श्री दखने परिवार की कन्या कु. फुलनबाई के साथ संपन्न हुआ. गुरुजी शिक्षा के साथ साथ खेल ने भी कुशल खिलाडी थे. कबड्डी तथा फुटबॉल उनके प्रिय खेल थे. धिरे धिरे गुरुजी की रुची समाजसेवा की ओर बढ़ने
लगी और वह अंत तक कायम रही, गुरुजी संघ के निष्ठावान स्वयंसवेक थे. संघ के द्वारा दि. 9 दिसंबर 1948 को देशव्यापी सत्याग्रह आंदोलन सुरु किया गया उस समय गुरुजी मात्र 20 वर्ष के थे उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन में सक्रीय रुप से हिस्सा लिया. गुरुजी के इस काम से खुश होकर संघ ने उन्हें 1950 में आमगांव मंडल कार्यवाह तथा 1951 में गोंदिया तालुका कार्यवाह जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी थी, आज का संघर्ष भविष्य के लिए क्षमता निर्माण करता है, राजनिती में पदार्पण करने के बाद गुरुजी ने सभा, आंदोलन, मोर्चा आदि के माध्यम से जनता की ज्वलंत समस्याओं को उठाने का काम किया, गुरुजी की क्षमता एवं प्रतिभा का प्रभाव जनसामान्य में दिखने लगा. 1967 मे हुये विधानसभा चुनाव में गुरुजी प्रचंड यहुमतो से जितकर आये. इसी कालखंड में गुरुजी के प्रयास स्वरुप राज्य सरकार द्वारा एक प्रथा सुरु की गयी, जिसके माध्यम से मार्केटींग सोसायटीयो का खाद वितरण प्रणाली की सुरुवात हुयी. गुरुजी के प्रयास से ही 1967 में बिजली प्रसार का कार्य आरंभ हुआ. विद्युत सडक निर्माण, पुल निर्माण क्षेत्र में विकास की गंगा बहने लगी. आमगाव सालेकसा के बिच एस.टी. बस सेवा प्रारंभ की गयी, गुरुजी के प्रयास से बांध प्रकल्पग्रस्तो की क्षतीपूर्ती तथा पूनर्वसन का प्रश्न अतिशिघ्र हल किया गया. इस प्रकार गरुजी ने राजनितीक क्षमता का सद्धपयोग समाज विकास के लिए किया. अनेक विषय काम संपन्न करके अध्येय गुरुजी ने दिखा दिये कि, एक जननेता व समाजसुधारक कैसा होना चाहिए, श्रध्देय, लक्ष्मणराव मानकर गुरुजी महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा कार्यकारणी के दो बार उपाध्यक्ष और दिर्घकालीन आमंत्रित सदस्य रहे. यह जिवन के अंतीम क्षण तक भाजपा के महाराष्ट्र प्रदेश कार्यकारणी में पदाधिकारी रहे, दिपक मिट्टी का या सोने का यह महत्वपूर्ण नहीं है, वह अंधेरे में कितना प्रकाश देता है यह महत्वपूर्ण है, इस क्षेत्र के लोगों के जीवन में नया प्रकाश फैलाने का कार्य गुरुजी ने जीवनभर किया, शिक्षा के बिजारोपण से ज्ञान का प्रकाश फैलाना गुरुजी के जीवन का एक
सपना था, प्राचिन भारत के साहित्य, साहित्यकार एवं सर्वश्रेष्ठ नाटककार भवभूती को लोग लंबे समय तक याद रखे, विद्यार्थी उनके आदर्श को अपने जीवन में उतारने तथा ज्ञान के सागर में गोते लगाये इसलिए श्रध्देय गुरुजी ने भवभूती शिक्षण संस्था की स्थापना आमगांव में की. आदर्श विद्यालय की स्थापना की, 1963 में चोपा नामक छोटेसे गाव में रविन्द्र विद्यालय तथा 1969 में आमगाव में भवभूती महाविद्यालय की सुरुवात की गयी. इस विद्यालय के माध्यम से उच्चशिक्षा की समस्या को हल किया गया. गुरुजी के हृदय में स्वामी रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद के लिए अपार श्रध्दा थी. गुरु व शिष्य दोनो इनके समान ज्ञानवान कुशल व बुध्दिमान ऐसा सपना गुरुजी का था. सर्वधर्म समभाव की भावना हृदय मे जगाकर स्वराष्ट्र व स्वधर्म की कोती पताका हमेशा लहराता रहे ऐसी कल्पना गुरुजी की थी, इसी कल्पना को साकार करने के लिए गुरुजी ने 1970 में कुन्हाडी में उन्होने रामकृष्ण विद्यालय की स्थापना की, पढे-लिखे बेरोजगार युवको को रोजगार प्रदान कराने के लिए आमगाव में औषधी निर्माणशास्त्र (पदवी परिक्षा फार्मसी कॉलेज) की सुरुवात की जिसके माध्यम से स्वयंरोजगार तथा अनेक प्रकार की नोकरी का माध्यम गुरुजी ने उपलब्ध करवाये, इसके साथ ही संस्था में पॉलीटेक्नीक कॉलेज, बी.एड., डी.एड. एवं आय.टी. आय. जैसे व्यवसायीक कोर्स सुरु करके इस आमगांव क्षेत्र के शैक्षणिक पिछड़ेपण को दूर करने का प्रयास किया, किसी भी संकट के बिना मिलनेवाली सफलता विजय होता है. लेकिन अनेक संकटो का मुकाबला कर प्राप्त किया हुआ विजय इतिहास बनाता है. निशित ही श्रध्देय गुरुजी ने इतिहास रच डाले, सामान्य लोगो की सेवा में उन्होंने अपना सारा जीवन झोंक दिया सबको साथ लेकर प्रभावी रूप से गुरुजी ने इस क्षेत्र का कुशल नेतृत्व किया. गंभीर संकटों का सामना करते हुये आदरणीय गुरुजी ने गरीब तथा जरुरतमंद लोगो की सेवा की गुरुजी की प्रेरणादायी जीवनकला आनेवाली पिढी को मार्गदर्शन करते रहेगी इसने जरामी संदेह नहीं है. बध्देय लक्ष्मणराव मानकर गुरुजी की पावन स्मृती मे विनम्र अभिवादन शतशत-कोटीकोटी नमन….. डॉ. डी.के. संधी





Total Users : 882487
Total views : 6487764
