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कृष्ण कन्हैया कान्हा की इस कहानी से जुड़ा है 56 भोग का कनेक्शन, जानें इससे जुड़ा राज

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प्रतिनिधी/ तुषार कमल पशिने

हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण की पूजा सभी दुखों को दूर करके सुख-सौभाग्य दिलाने वाली मानी गई है। पूर्णावतार माने जाने वाले श्रीकृष्ण का जन्म हर साल भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस साल स्मार्त यानि गृहस्थ लोग कान्हा का जन्मोत्सव 6 सितंबर 2023 की रात को तो वहीं वैष्णव परंपरा को मानने वाले और इस्कॉन से जुड़े लोग जन्माष्टमी का पर्व 7 सितंबर 2023 की रात को मनाएंगे।

 भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव पर कान्हा के भक्त उनकी पूजा में तमाम चीजों के साथ 56 भोग चढ़ाते हैं। कान्हा को आखिर 56 ही भोग क्यों चढ़ाए जाते हैं और क्या है इस संख्या का धार्मिक महत्व, आइए विस्तार से जानते हैं।

56 भोग से जुड़ी कहानी हिंदू मान्यता के अनुसार एक बार ब्रजमंडल में जब लोग इंद्र देवता की विशेष पूजा की तैयारी करने में जुटे हुए थे तो कान्हा ने उनसे इसके पीछे का कारण पूछा। तब लोगों ने बताया कि इंद्र देवता की पूजा के लिए इतनी बड़ी पूजा का आयोजन इसलिए किया जा रहा है ताकि वे प्रसन्न होकर अच्छी वर्षा करें और खूब अच्छी फसल हो। इस पर कान्हा ने कहा कि हमें फल और सब्जिया तथा पशुओं को चारा तो हमें गोवर्धन पर्वत से मिलती है फिर हम उनकी क्यों पूजा करें। 

इसके बाद उन्होने लोगों को इंद्र की बजाय गोवर्धन की पूजा करने को कहा।

जब यह बात इंद्र को पता लगी तो उन्होंने ब्रजमंडल पर सात दिनों तक लगातार बारिश की। जिससे बचाने के लिए कान्हा ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर 7 दिनों तक बगैर कुछ अन्न ग्रहण किए उठाए रखा। मान्यता है आठवें दिन जब इंद्र का घमंड टूट गया तो लोगों ने भगवान श्रीकृष्ण को 56 प्रकार के भोग लगाकर खाने के लिए दिये।

56 भोग लगाने का महत्व हिंदू मान्यता के अनुसार एक दिन में आठ प्रहर होते हैं और भगवान श्रीकृष्ण एक दिन आठ बार भोजन करते थे। चूंकि भगवान कृष्ण ने देवताओं के राजा इंद्र को सबक सिखाने के लिए 7 दिनों तक लगातार गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली में उठाए रखा, इसलिए वे भोजन नहीं कर पाए। ऐसे उन्हें सात दिनों के हिसाब से कुल 56 तरह के भोग बनाकर खिलाया गया।

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